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ग़ज़ल: सामने तुम हो तो

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सामने तुम हो तो भला कहो किसे क्यों देखें।  अपनी कायनात पर हम सबको लानत भेजें।। बहुत प्यार से तुमने मुस्कुरा के जब हां कर दी है। ऐसे में फिर भला हम कल की क्यों सोचते फिरें।। बमुश्किल जिंदगी है आए ये मुकाम किसी के हिस्से। रात की घनी जुल्फों में चांदनी जब गलबहियां डाले।। रास्ते सफर के पेंचोखम भरे हैं ये मालूम है हमें यारब।  हाथ में है अगर हाथ उसका तो फिक्र भला काहे करें।। खुद पे कहाँ जरा सा भी है भरोसा कसम से "उस्ताद"। ये तो उसका जलवा है जो बन रहे हैं काम राम-भरोसे।। नलिनतारकेश@उस्ताद

ग़ज़ल: हर वक्त मांगते

जरूरतॆं तो थोड़ी मगर कितनी बेहिसाब हैॆं चाहतें। दॊनॊं हथेली फैलाकर हम तो हर वक्त बस मांगते।। वक्त का जब तक दांव चले तब तलक सब ठीक है।  वर्ना तो खुदा जाने कब वो अशॆ से फर्श पे पटक दे।। एक महज़ ख़्वाब ही तो है हमारी ये नायाब जिंदगी। किसी को खुशगवार तो किसी को वो हलकान करे।। जो मगरूर हो बटोरते रहे बस ऐशोआराम अपने लिए।  अनगिनत ऐसे शख्स दम तोड़ते अक्सर बेसहारा दिखे।। ये जिंदगी कसम से कोरी लफ़्फाज़ी के सिवा कुछ है नहीं।  जाने क्यों भला "उस्ताद" मोहब्बत लोग इससे करते चले।। नलिन तारकेश @उस्ताद