ग़ज़ल: सामने तुम हो तो
सामने तुम हो तो भला कहो किसे क्यों देखें।
अपनी कायनात पर हम सबको लानत भेजें।।
बहुत प्यार से तुमने मुस्कुरा के जब हां कर दी है।
ऐसे में फिर भला हम कल की क्यों सोचते फिरें।।
बमुश्किल जिंदगी है आए ये मुकाम किसी के हिस्से।
रात की घनी जुल्फों में चांदनी जब गलबहियां डाले।।
रास्ते सफर के पेंचोखम भरे हैं ये मालूम है हमें यारब।
हाथ में है अगर हाथ उसका तो फिक्र भला काहे करें।।
खुद पे कहाँ जरा सा भी है भरोसा कसम से "उस्ताद"।
ये तो उसका जलवा है जो बन रहे हैं काम राम-भरोसे।।